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उदारीकरण का सच

Manufacturer: Sevika Prakashan
मानव यह एक निर्जीव वस्तु नहीं है, उसको शरीर के साथ साथ मन, बुद्धि, आत्मा भी होती है| अत: केवल शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करनेवाली अर्थनीति का त्याग करना होगा| अन्यथा नित्य नयी इच्छाएँ निर्माण होंगी, उनकी पूर्ति के लिये प्रकृति की मर्यादाओं की अनदेखी की जायेगी तथा निसर्गसाधनों के साथ अत्याचार होगा| ऐसी नीति मानवसभ्यता तथा प्रदूषण विषयक गंभीर समस्याएँ खड़ी करेगी| यह भारत की अर्थनीति की विचार धारा है|  भारत में उदारीकरण प्रयोग के कारण अर्थ व्यवस्था पर होनेवाले परिणामों का विश्‍लेषण करने का यह प्रयास है| इस पृष्ठभूमि पर उदारीकरण के बारे में भारत एवं अन्य देशों के अनुभवों के पश्‍चात, अर्थव्यवस्था में राज्य का सहभाग कैसा हो इसकी चर्चा भी इस पुस्तिका में है|
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मानव यह एक निर्जीव वस्तु नहीं है, उसको शरीर के साथ साथ मन, बुद्धि, आत्मा भी होती है| अत: केवल शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करनेवाली अर्थनीति का त्याग करना होगा| अन्यथा नित्य नयी इच्छाएँ निर्माण होंगी, उनकी पूर्ति के लिये प्रकृति की मर्यादाओं की अनदेखी की जायेगी तथा निसर्गसाधनों के साथ अत्याचार होगा| ऐसी नीति मानवसभ्यता तथा प्रदूषण विषयक गंभीर समस्याएँ खड़ी करेगी| यह भारत की अर्थनीति की विचार धारा है| 

भारत में उदारीकरण प्रयोग के कारण अर्थ व्यवस्था पर होनेवाले परिणामों का विश्‍लेषण करने का यह प्रयास है| इस पृष्ठभूमि पर उदारीकरण के बारे में भारत एवं अन्य देशों के अनुभवों के पश्‍चात, अर्थव्यवस्था में राज्य का सहभाग कैसा हो इसकी चर्चा भी इस पुस्तिका में है|

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